बिना टिकट

जरा बच के

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Santosh Tiwari, Jagran

Deputy Editor- Features

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क्‍या ये प्‍यार है?

Posted On: 6 Jan, 2010  
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घूस दूं या नहीं?

Posted On: 5 Jan, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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यह कैसा प्यार है ? मगध महाविद्यालय कॉलेज, चंडी, नालंदा, बिहार जहाँ १०० से भी ऊपर शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारी कार्य करते है. वहाँ के प्राचार्य तथा शासी निकाय की तानाशाही तथा मनमाने ढंग से वित का दुरूपयोग करते हुए लगभग ३५ शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारीयो का वेतन नहीँ देने के चलते उनका तथा उनके परिवार भुखमरी के कगार पर पूरी तरह से हैं तथा शेष जिनका वेतन दिया भी जाता है वह कुल वेतन का नाममात्र का ही हिस्सा होता है. जिससे उनका भी भरण पोषण नहीं हो पा रहा है. माननीय मुख्यमंत्री के द्वारा दिए जा रहे लाखो रुपये अनुदान के अधिकांश भाग को प्राचार्य तथा शासी निकाय के द्वारा वेतन के रूप में जब्त कर लिया जाता है. कुछ लोगो को उनके वेतन का एक बहुत छोटा हिस्सा ही दिया गया तथा लगभग ३५ शिक्षक एवं शिक्षकेतर कर्मचारियों को पूर्णतः वेतन नहीं दिया गया. इस कॉलेज के प्राचार्य की दबंगता इतनी है की इनके दर से कोई भी कर्मचारी अपना मुह तक नहीं खोल पाता है. पैसे की कमी तथा परिवार की भुखमरी इन कर्मचारियों की नियति बन चुकी है.

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मैं नहीं जानता कि आपने जो कुछ भी लिखा है वह सच है या आपके दिमाग में चल रही भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मुहिम, लेकिन जो भी हो आपने एक ऐसे सच को सभी के सामने लाने का प्रयास किया है जिसकी सामना हर एक व्यक्ति कभी न कभी अपनी जिंदगी में करता है। मैं सच कहूं तो मेरे लिए भी आपके सवाल का जवाब देने बहुत ही मुश्किल होगा क्योंकि अगर मैं देश को आगे रखकर सोचती हूं तो घूस नहीं दे सकता और अगर आपके बच्चे के भविष्य को देखता हूं तो 50 रुपये की राशी कोई बड़ी भी नहीं है। इस बारे में मेरा सिर्फ एक ही विचार है कि पहले अपने आप को इस काबिल बनाओ की आप इस भ्रष्टाचार रूपी राक्षस का मुकाबला कर सको और इसके लिए आपको चाहिए की आप अपने बेटे का दाखिला करा दें बाकी बाद में निपट लेना।

के द्वारा:

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क्यों भाई, क्या पंडित ने बताया है कि इसी इंस्टीट्यूट में एडमिशन लेना है ? आज कल ढेरों एक से एक इंस्टीट्यूट खुले पड़े हैं। पहले तो वहां जाकर फीस जमा कीजिए और बच्चे का भविष्य सुरक्षित कीजिए। इसके बाद इस बाबू को सबक सिखाने की ठान लीजिए। अभी तो दो दिन बाकी हैं आखिरी दिन में। आपके बेटे जैसे और भी होंगे जिनकी फीस जमा होने से रह गई होगी। बाबू के दफ्तर के बाहर खड़े हो कर इस तरह के लोगों को संगठित करिए। प्रिंसिपल बाहर हैं तो क्या, कुलपति से मिलें,मंत्री से मिलें। कोई ना सुने तो मीडिया तो है ही आप जैसे लोगों की आवाज उठाने के लिए। पर भाई घूस कभी मत देना नहीं तो इस तरह के घूसखोर देश से कभी खत्म नहीं हो सकेंगे।

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